ईसा पूर्व छठी सदी से पूर्वी उत्तरप्रदेश और  पश्चिमी  बिहार में लोहे का व्ययक प्रयोग होने से बड़े बड़े प्रादेशिक या जनपद राज्यों के निर्माण के लिए उपयुक्त परिस्थितियां बन गयी ।l लोहे  के हथियारों के इस्तेमाल होने के कारन योद्धा वर्ग महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा । खेती के नए औज़ारो एवं उपकरणों की मदद से किसान आवश्यकता से अधिक अनाज पैदा करने लगा ।

जिससे जनपदों का निर्माण प्रशस्त हुआ । पाणिनि के अनुसार 450 ई0 पू 0 में 40 जनपद थे ।

पाली पुस्तकों से पता चलता है की जनपद बढ़कर महाजनपद बन गए ।

बुद्धा के समय 16 महाजनपद थे  ईसा पूर्व छठी सदी के आगे के भारत का राजनैतिक इतिहास इन राज्यों के बीच प्रभुत्व के लिए संघर्ष का इतिहास है । अंततः मगध राज्य सबसे शक्तिशाली बन गया और साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा ।


 

मगध के सबसे प्राचीन वंश के संस्थापक बृहद्रय था। इसकी राजधानी गिरिब्रज (राजगृह) थी। जरासंध बृहद्रथ का पुत्र था।

हर्यक वंश के संस्थापक बिम्बिसार मगध की गद्दी पर 544 ई.पू. (बौद्ध ग्रंथों के अनुसार) में बैठा था। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी या। यह प्रथम भारतीय राजा था जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर बल दिया। – बिम्बिसार ने ब्रह्मदत्त को हराकर अंग राज्य को मगध में मिला लिया। > बिम्बिसार ने राजगृह का निर्माण कर उसे अपनी राजधानी बनाया। बिम्बिसार ने मगध पर करीब 52 वर्षों तक शासन किया।

महात्मा बुद्ध की सेवा में बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भेजा। अवन्ति के राजा प्रद्योत जब पाण्डु रोग से ग्रसित थे उस समय भी बिम्बिसार ने जीवक को उनकी सेवा-सुश्रूषा के लिए भेजा था। > बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से, वैशाली के चेटक की पुत्री चेल्लना से तथा मद्र देश (आधुनिक पंजाब) की राजकुमारी क्षमा से शादी की।

बिम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 493 ईसा पूर्व में मगध की गद्दी पर बैठा। इसका उपनाम कणिक था। वह प्रारंभ में जैनथम का अनुयायी था। – अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक मगध पर शासन किया।

अजातशत्रु के सुयोग्य मंत्री का नाम वर्षकार (वरस्कार) था। इसी की सहायता से अजातशत्रु ने वैशाली पर विजय प्राप्त की। – 461 ई.पू. में अपने पिता की हत्या कर उदायिन मगध की गद्दी पर बैठा। – उदायिन ने पाटिलग्राम की स्थापना की । वह जैनधर्म का अनुयायी था।

हर्यक वंश का अंतिम राजा उदायिन का पुत्र नागदशक था। नागदशक को उसके अमात्य शिशुनाग ने 412 ईसा पूर्व में अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना की। शिशनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से हटाकर वैशाली में स्थापित की। शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक पुनः राजधानी को पाटलिपुत्र ले गया। शिशुनाग वंश का अंतिम राजा नंदिवर्धन था। – नंदवंश का संस्थापक महापद्मनंद था। – नंदवंश का अंतिम शासक घनानंद था । यह सिकन्दर का समकालीन था। इसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने युद्ध में पराजित किया और मगध पर एक नये वंश मौर्य वंश’ की स्थापना की।

मौर्य साम्राज्य का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई.पू. में हुआ था। जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सेन्ड्रोकोट्टस कहा है, जिसकी पहचान चलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त मौर्य से की है। विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल (आशय-निम्न कुल में उत्पन्न) शब्द का प्रयोग किया गया। घनानंद को हराने में चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) ने चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चन्द्रगुप्त का प्रधानमंत्री बना। इसके द्वारा लिखित पुस्तक अर्थशास्त्र है, जिसका संबंध राजनीति से है। चन्द्रगुप्त मगध की राजगद्दी पर 322 ईसा पूर्व में बैठा | चन्द्रगुप्त जैनधर्म का अनुयायी था। चन्द्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया। चन्द्रगुप्त ने 305 ईसा पूर्व में सेल्यूकस निकेटर को हराया। सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया की शादी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि-शर्तों के अनुसार चार प्रांत काबुल, कन्धार, हेरात एवं मकरान चन्द्रगप्त को दिए। चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैनी गुरु भद्रबाहु से जैनधर्म की दीक्षा ली थी। मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त के दरबार में रहता था। मेगस्थनीज द्वारा लिखी गयी पुस्तक इंडिका है। मेगस्थनीज के अनुसार-सम्राट का जनता के सामने आने के अवसरों पर शोभा यात्रा के रूप में जश्न मनाया जाता है। उन्हें एक सोने के पालकी में ले जाया जाता है। उनके अंगरक्षक सोने और चाँदी से अलंकत हाथियों पर सवार रहते हैं। कुछ अंगरक्षक पेड़ों को लेकर चलते हैं।इन पेड़ों पर प्रशिक्षित तोतों का झुण्ड रहता है जो सम्राट के सिर के चारों तरफ चक्कर लगाता रहता है। राजा सामान्यतः हथियारबंद महिलाओं से घिरे होते हैं। उनके खाना खाने के पहले खास नौकर उस खाने को चखते हैं। वे लगातार दो रात एक ही कमरे में नहीं सोते थे। पाटलिपुत्र के बारे में : पाटलिपुत्र एक विशाल प्राचीर से घिरा है, जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्वार हैं। दो और तीन मंजिल वाले घर लकड़ी और कच्ची ईंटों से बने हैं। राजा का महल भी काठ का बना है जिसे पत्थर की नक्काशी से अलंकृत किया गया है। यह चारों तरफ से उद्यानों और चिड़ियों के लिए बने बसेरों से घिरा है। चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के बीच हुए युद्ध का वर्णन एप्पियानस ने किया है। प्लूटार्क के अनुसार चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500हाथी उपहार में दिए थे। > चन्द्रगुप्त की मृत्यु 298 ई.पू. में श्रवणबेलगोला में उपवास द्वारा हुई।

बिन्दुसार- चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिन्दुसार हुआ, जो 298 ईसा पूर्व में मगध की राजगद्दी पर बैठा । इसे अमित्रघात के नाम से जाना जाता है। अमित्रघात का अर्थ है….शत्रु विनाशक । > बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।  वायुपुराण’ में बिन्दुसार को भद्रसार (या वारिसार) कहा गया है । > स्ट्रैबो के अनुसार सीरियन नरेश एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा। इसे ही मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है। > जैन ग्रंथों में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है। बिन्दुसार के शासनकाल में तक्षशिला (सिन्धु एवं झेलम नदी के बीच) में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इस विद्रोह को दबाने के लिए बिन्दुसार ने पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा। एथीनियस के अनुसार बिन्दुसार ने सीरिया के शासक एण्टियोकस-I से मदिरा, सूखे अंजीर एवं एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी। > बौद्ध विद्वान् तारानाथ ने बिन्दुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है। बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मंत्रिपरिषद थी जिसका प्रधान खल्लाटक था।

 

अशोक > बिन्दुसार का उत्तराधिकारी अशोक महान हुआ जो 269 ईसा पूर्व में मगध की राजगद्दी पर बैठा। अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था। (दिव्यावदान के अनुसार) । > राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवन्ति का राज्यपाल था। मास्की, गुजरी, नेत्तुर एवं उडेगोलम के लेखों में अशोक का नाम अशोक मिलता है। कर्नाटक के गुलबर्गा जिला के कनगनहल्ली से प्राप्त उभारदार मूर्तिशिल्प (रिलीफ स्कल्प्चर) शिलालेख में अशोक के प्रस्तर रूपचित्र के साथ राण्यो अशोक (राजा अशोक) उल्लिखित है। > भ्रावु अभिलेख में अशोक ने स्वयं को मगध का राजा बताया है। > पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है। अशोक ने अपने अभिषेक के 8 वर्ष बाद लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया। (उल्लेख 13 वें शिलालेख में) – प्लिनी का कथन है कि मिस्र का राजा फिलाडेल्फस [टॉलमी II] ने पाटलिपुत्र में डियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।

उपाप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।अशोक पहले ब्राह्मण धर्मका अनुयायी था। कल्हण के राजतरंगिणी से पता लता है कि वह शैव धर्म का उपासक था। नियोध के प्रवचन सुनकर उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया। – अहरौरा लेख में यह घोषणा की गई है कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म का अनुयायी था। अशोक एक उपासक के रूप में अपने राज्याभिषेक के 10 वें वर्ष बांधगया की. 12 वर्ष निगालि सागर की एवं 20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की।  अशोक ने आजीवकों को रहने हेतु बराबर की पहाड़ियों में चार गुफाओं का निर्माण करवाया, जिनका नाम कर्ज, चोपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी था। अशोक के पौत्र दशरथ ने आजीविकों को नागार्जुन गुफा प्रदान की थी। अशोक के 7वें स्तम्भ लेख में आजीविकों का उल्लेख किया गया है तथा महामात्रों को आजीविकों के हितों का ध्यान रखने के लिए कहा गया है। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। बौद्ध परंपरा और उनके लिपियों के अनुसार अशोक ने 84,000 स्पूपों का निर्माण किया था। भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने किया। अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है। ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से, खरोष्ठी लिपि का अभिलेख शाहवाजगढ़ी एवं मनसेहरा (पाकिस्तान) से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि के अभिलेख मिले हैं। खरोष्ठी लिपि दायीं से बायीं र लिखी जाती थी

अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है.. 1. शिलालेख, 2. स्तम्भलेख तथा 3. गुहालेख ।

अशोक के शिलालेख की खोज 1750 ई. में पाद्रेटी फेन्थैलर ने की थी। इनकी संख्या-14 है। अशोक के अभिलेख पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ई. में जेम्स प्रिसेप को हुई।

अशोक के प्रमुख शिलालेख एवं उनमें वर्णित विषय :

शिलालेख पहला इसमें पशुबलि की निंदा की गयी है।

दूसरा मनुष्य व पशु दोनों की चिकित्सा-व्यवस्था का उल्लेख है।

तीसरा इसमें राजकीय अधिकारियों को यह आदेश दिया गया है कि वे हर पाँचवें वर्ष के उपरान्त दौरे पर जाएँ। इसमें

कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख है।

चौथा इसमें भेरीघोष की जगह धम्मघोष की घोषणा की गयी है।

पाँचवाँ इसमें धर्म-महामात्रों की नियुक्ति की जानकारी मिलती है।

छठा इसमें आत्म-नियंत्रण की शिक्षा दी गयी है।

7 वाँ व 8 वाँ इनमें अशोक की तीर्थ-यात्राओं का उल्लेख है।

नौवाँ इसमें सच्ची भेट तथा सच्चे शिष्टाचार का उल्लेख है।

दसवाँ इसमें अशोक ने आदेश दिया है कि राजा तथा उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित में सोचें।

ग्यारहवाँ इसमें धम्म की व्याख्या की गयी है। इसमें स्त्री महामात्रों की नियुक्ति एवं सभी प्रकार के विचारों

के सम्मान की बात कही गयी है।

तेरहवाँ इसमें कलिंग युद्ध का वर्णन एवं अशोक के हृदय-परिवर्तन की बात कही गयी है। इसी में पाँच यवन राजाओं के नामों

का उल्लेख है, जहाँ उसने धम्म प्रचारक भेजे।

चौदहवा अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया। >

अशोक के स्तम्भ-लेखों की संख्या 7 है, जो केवल ब्राह्मी लिपि में लिखी गयी है। यह छह अलग-अलग स्थानों से प्राप्त हुआ है प्रयाग स्तम्भ-लेख यह पहले कौशाम्बी में स्थित था। इस स्तम्भ लेख को अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित कराया। दिल्ली टोपरा ; यह स्तम्भ-लेख फिरोजशाह तुगलक के द्वारा टोपरा उत्तरापथ  से दिल्ली लाया गया।

दिल्ली-मेरठ -पहले मेरठ में स्थित यह स्तम्भ लेख फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया है। रामपुरवा यह स्तम्भ-लेख चम्पारण (बिहार) में स्थापित है। इसकी खोज 1872 ई. में कारलायल ने की। लौरिया अरेराज : चम्पारण (बिहार) में। लौरिया नन्दनगढ़ चम्पारण (बिहार) में इस स्तम्भ पर मोर का चित्र बना है।- कौशाम्बी अभिलेख को ‘रानी का अभिलेख’ कहा जाता है।

अशोक का 7वाँ अभिलेख सबसे लम्बा है।

अशोक का सबसे छोटा स्तम्भ लेख रुम्मिदेई है। इसी में लुम्बिनी में धम्म यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू राजस्व की दर घटाकर 1/8 भाग कर दिया और लुम्बिनी ग्राम का धार्मिक कर (बलि) माफ कर दिया।

महास्थान (बांग्लादेश) से प्राप्त सोहगौरा का ताम्रपत्र अभिलेख में मौर्यकाल में अकाल, सूखा जैसे दैवी प्रकोप के समय राज्य द्वारा राहत कार्य किए जाने का विवरण प्राप्त होता है।

प्रथम पृथक् शिलालेख में यह घोषणा है कि सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।

अशोक का शार-ए-कुना (कंदहार) अभिलेख ग्रीक एवं आर्मेइक भाषाओं में प्राप्त हुआ है।

साम्राज्य में मुख्यमंत्री एवं पुरोहित की नियुक्ति के पूर्व इनके चरित्र को काफी जाँचा-परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।

सम्राट् की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद् होती थी जिसमें सदस्यों की संख्या 12, 16 या 20 हुआ करती थी।

अर्थशास्त्र में शीर्षस्थ अधिकारी के रूप में तीर्थ का उल्लेख मिलता है, जिसे महामात्र भी कहा जाता था। इसकी संख्या 18 थी। अर्थशास्त्र में चर जासूस को कहा गया है। .

. अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी। प्रांतों को चक्र कहा

जाता था। प्रांतों के प्रशासक – कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे।

प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था, जो विषयपति के अधीन होते थे। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामीक कहलाता था। प्रशासकों में सबसे छोटा गोप था, जो दस ग्रामों का शासन सँभालता था।

मेगस्थनीज के अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों का एक मंडल करता था जो 6 समितियों में विभाजित था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।

बिक्री-कर के रूप में मल्य का 10वाँ भाग वसला जाता था इसे बचाने वालों को मृत्युदंड दिया जाता था।

मेगस्थनीज के अनुसार एग्रोनोमाई मार्ग-निर्माण अधिकारी था।

जस्टिन के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना में लगभग 50,000 अश्वारोही सैनिक, 9,000 हाथी व 8,000 रथ थे।

अर्थशास्त्र में वर्णित तीर्थ:

1 मंत्री- प्रधानमंत्री

2 पुरोहित -धर्म एवं दान विभाग का प्रधान

3.सेनापति- सैन्य विभाग का प्रधान

4. युवराज- राजपुत्र

5.दौवारिक -राजकीय द्वार-रक्षक

6.अन्तर्वेदिक -अन्तःपुर का अध्यक्ष

7.समाहर्ता -आय का संग्रहकर्ता

8.सन्निधाता- राजकीय कोषाध्यक्ष

9.प्रशास्ता- कारागार का अध्यक्ष

10.प्रदेष्ट्रि – कमिश्नर

11. पौर – नगर का कोतवाल

12 व्यवहारिक – प्रमुख न्यायाधीश

13.नायक- नगर-रक्षा का अध्यक्ष

14.कर्मान्तिक- उद्योगों एवं कारखानों का अध्यक्ष

15.मंत्रिपरिषद् – अध्यक्ष

16 दण्डपाल- सेना का सामान एकत्र करनेवाला

17 दुर्गपाल : – दुर्ग-रक्षक

18.अंतपाल – सीमावर्ती दुर्गों को रक्षक

Ashok ke samay janpadiy  न्यायालय के न्यायाधीश को rajuk  कहा जाला था।

सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था। बिना वर्षा के achhi  kheti होनेवाली भूमि को अदेवमातूक कहा जाता था।

मौर्य काल को द्रोण अनाज के माप के लिए प्रयोग होता था।

कोगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है.1.दार्शनिक, 2. किसान, 3. अहीर, 4. कारीगर, 5. सैनिक 6. निरीक्षक एवं 7 सभासद।

स्वातंत्र वेश्यावृत्ति को अपनाने वाली महिला रूपाजीवा कहलाती थी। नंद वंश के विनाश करने में चन्द्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता प्राप्त की थी।

मौर्य शासन 137 वर्षों तक रहा। भागवत पुराण के अनुसार मौर्य  वश में दस राजा हुए जबकि वायु पुराण के अनुसार नौ राजा हुए मौर्य वंश का अतिम शासक बृहद्रथ था। इसकी हत्या इसकी सेनापति पुष्यमित्र शुग ने 185 ईसा पूर्व में कर दी और मगध पर शुग वश की नीव डाली।

अशोकाराम विहार पाटलिपुत्र में था।

आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना मक्खलिपुत्र गोसाल ने की थी


प्रश्न एवं उत्तर :-

निम्न में से कौन सा पहाड़ी जैन धर्म के लिए पवित्र है

  1. अर्बुदा गिरी २। सत्रुंजयगिरि ३। चंद्र गिरी ४। उर्जायन्तगिरि

सभी महत्वपूर्ण है । 1-3 तक चन्द्रगुप्त मौर्य ने आत्मनिग्रह किया था । उर्जायन्तगिरि राजगीर में स्थित जैन का पवित्र पहाड़ी है ।

अशोक को उसके नाम से किस अभिलेख में वर्णन किया गया है 

  1. मस्की और गुर्जरा २। धौली , रुपनाथ ३। निट्टूर उडगोलम मस्की एवं गुर्जरा ४। कंधार बैराट येर्रागुड़ी एंड मस्की

निट्टूर उडगोलम मस्की एवं गुर्जरा अभिलेखों में अशोक को नाम से वर्णन किया गया है शेष अभिलेखों में उसे देवनामपिय से उद्धृत किया गया है

चन्द्रगुप्त सभा “कौंसिल ऑफ़ चन्द्रगुप्त” का वर्णन किस पुस्तक में मिलता है

  1. अर्थशास्त्र २। मुद्राराक्षस  3. महाभाष्य ४। परिशिष्टपर्वन 

२।  किस मौर्य शासक को अमित्रघात नाम से जाना जाता था

    1. बिन्दुसार २। दसरथ ३। सलिसुका ४। बृहद्रथ

३। खरोष्ठी लिपि किस लिपि से ली गई है?

  1. चित्र लिपि 2.कीलाकार लिपि  ३। अरमाइक ४। ब्राह्मी लिपि

४। किस ग्रन्थ में मौर्य का वर्णन क्षत्रिय रूप में किया गया है

  1. मुद्राराक्षस २। ग्रीक साहित्य ३। अर्थशास्त्र ४। दिव्यावदान

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